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प्रेमचंद के फटे जूते पाठ में लेखक ने लोगों पर क्या व्यंग्य कि या है?

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(ख) व्यंग्य-लोगों में एक प्रवृत्ति होती है बुराइयों को छिपाने की या उन पर पर्दा डालने की। लोग अपनी बुराइयों को दूसरों के सामने नहीं आने देना चाहते हैं, पर प्रेमचंद ने अपनी बुराइयों को कभी छिपाने का प्रयास नहीं किया। वे भीतर-बाहर एक समान थे। दूसरे लोग पर्दे की आड़ में कुछ भी करते रहे हैं।

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